प्यार, सपने और जिद: ‘मुसाफिर कैफ़े’ की एक ईमानदार समीक्षा

‘मुसाफिर कैफ़े’ कहानी है सुधा और चंदर की, जो दोनों एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं। घरवालों के कहने पर दोनों शादी के सिलसिले में मिलते हैं। लेकिन सुधा एक डिवोर्स वकील होने के नाते कई शादियों को टूटते हुए देख चुकी है, इसलिए वह शादी नहीं करना चाहती। सॉफ्टवेयर इंजीनियर चंदर भी उसकी बात से सहमत हो जाता है। धीरे-धीरे दोनों के बीच प्यार होता है और वे लिव-इन में रहने लगते हैं। अगर सुधा शादी न करने की अपनी ज़िद पर न अड़ी होती, तो शायद वे शादी भी कर लेते। लेकिन जिंदगी हमारी मर्जी से नहीं चलती, और आखिरकार दोनों के रास्ते अलग हो जाते हैं। क्या वे फिर कभी एक हो पाएंगे? या दुनिया बीच में आ जाएगी?

सुधा की ज़िद की वजह से ही दोनों अलग होते हैं, लेकिन वही ज़िद उसकी सबसे बड़ी खासियत भी है जो मुझे बहुत पसंद आई। वह किसी के लिए भी अपनी शर्तों से समझौता नहीं करती। ऐसी आत्मनिर्भरता के लिए बहुत हिम्मत चाहिए। हालांकि, उसकी कुछ बातें मुझे पसंद नहीं आईं; खास तौर पर जिस तरह से वह चंदर से बात करती थी। चंदर चाहे कुछ भी कहे, सुधा हमेशा उससे उल्टा ही बोलती! उसमें चंदर कभी जीत ही नहीं सकता था, जो मुझे थोड़ा अनुचित (unfair) लगा।

इसके बावजूद, ‘मुसाफिर कैफ़े’ बहुत ही खूबसूरत तरीके से लिखी गई कहानी है, जिसमें जिंदगी के छोटे-बड़े सबक बहुत सहजता से पिरोए गए हैं। लेखक ने हिंदी में जो विचार पेश किए हैं, उनका असली स्वाद हिंदी भाषा में ही आता है। मूल भाषा का मज़ा किसी अनुवाद में नहीं आता (सिवाय ‘घाचर घोचर’ जैसी किसी किताब के, जिसका अंग्रेजी अनुवाद भी मूल किताब जितना ही बेहतरीन था)।

इस कहानी में बॉलीवुड फिल्म जैसा मनोरंजन है, लेकिन इसका अंत आम बॉलीवुड फिल्मों जैसा बनावटी नहीं है। इसमें रिश्तों का सच्चा और व्यावहारिक पहलू दिखाया गया है—यह कि हर कहानी का अंत हमारी मनपसंद ‘हैप्पी एंडिंग’ वाला नहीं होता। दोनों किरदार जिद्दी हैं और पहल करने की हिम्मत नहीं दिखाते, जो आज के दौर के कई कपल्स में देखने को मिलता है।

संक्षेप में कहूं तो, ‘मुसाफिर कैफ़े’ हर उम्र के लोगों के लिए पढ़ने लायक किताब है। अगर आपको हिंदी पढ़नी आती है, तो यह किताब एक बार ज़रूर पढ़नी चाहिए!

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